रायपुर। बेटे को खोने का दर्द और उसके बाद बीमा क्लेम के लिए वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई। रायपुर निवासी अरविंद शाह की कहानी संघर्ष, धैर्य और न्याय की मिसाल बन गई है। करीब 16 साल तक न्याय के लिए लड़ने के बाद आखिरकार राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के हस्तक्षेप से उन्हें राहत मिली और बीमा कंपनी को क्लेम राशि का भुगतान करने का आदेश दिया गया।
जानकारी के अनुसार, दिसंबर 2009 में अरविंद शाह के बेटे का निधन हो गया था। इसके बाद परिवार ने बीमा क्लेम के लिए आवेदन किया, लेकिन एक डॉक्टर द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र के आधार पर बीमा कंपनी ने दावा खारिज कर दिया। परिवार का आरोप था कि मामले में गंभीर अनियमितताएं और फर्जीवाड़ा किया गया।
परिजनों के अनुसार, संबंधित डॉक्टर दो दिनों तक उनके घर में रहा और परिवार से बातचीत करने के बाद ऐसा प्रमाण पत्र जारी किया गया, जिसके आधार पर बीमा कंपनी ने क्लेम देने से इंकार कर दिया। इससे परिवार को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
न्याय की उम्मीद में परिवार ने पहले छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। इसके बाद अरविंद शाह ने हार नहीं मानी और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (दिल्ली) में अपील दायर की।
करीब 13 वर्षों तक चले कानूनी संघर्ष के दौरान आयोग ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और तथ्यों की विस्तृत जांच की। सुनवाई के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए पीड़ित परिवार के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने बीमा कंपनी को लगभग 1.21 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। आदेश के बाद परिवार को करीब 98 लाख रुपये की राशि प्राप्त हो चुकी है, जबकि शेष भुगतान की प्रक्रिया जारी है।
लंबे संघर्ष के बाद न्याय मिलने पर अरविंद शाह ने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी लोगों को अपने अधिकारों के लिए अंतिम स्तर तक लड़ाई लड़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि बेटे की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती, लेकिन न्याय मिलने से व्यवस्था पर उनका भरोसा कायम हुआ है।
यह मामला उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा और न्यायिक व्यवस्था की महत्ता को भी रेखांकित करता है। साथ ही यह संदेश देता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए दृढ़ता से संघर्ष करे तो देर से ही सही, न्याय मिल सकता है।