बस्तर खबर
लोक जीवन 6 जुलाई 2026 3 मिनट का पठन 16 घंटे पहले

धुरंधर और Citizen Vigilante -सिनेमा के जरिए समाज के गुस्से की कहानी

अपडेट किया गया: 1 घंटे पहले

'' सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। कई बार वह समाज के भीतर वर्षों से सुलग रहे आक्रोश, असुरक्षा, न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास और मानवीय संवेदनाओं को इस तरह पर्दे पर प्रस्तुत करता है ''

धुरंधर और Citizen Vigilante -सिनेमा के जरिए समाज के गुस्से की कहानी

सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। कई बार वह समाज के भीतर वर्षों से सुलग रहे आक्रोश, असुरक्षा, न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास और मानवीय संवेदनाओं को इस तरह पर्दे पर प्रस्तुत करता है कि दर्शक केवल कहानी नहीं देखता, बल्कि स्वयं को उसके भीतर खड़ा हुआ महसूस करता है।

हाल के समय में चर्चा में रही 'धुरंधर' और विवादों में घिरी 'Citizen Vigilante' ऐसी ही दो फिल्में हैं। दोनों की पृष्ठभूमि, पात्र और सामाजिक संदर्भ अलग-अलग हैं, लेकिन इनके केंद्र में एक ही प्रश्न मौजूद है—

यदि पीड़ित को न्याय मिलने की उम्मीद समाप्त हो जाए, तो उसके भीतर जन्म लेने वाले प्रतिशोध को क्या केवल अपराध कहकर समझा जा सकता है?

पीड़ा की पराकाष्ठा और एक भाई का आक्रोश

'धुरंधर' की कहानी उस मोड़ पर पहुंचती है, जब राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी नायक जस्सी के परिवार को पूरी तरह तबाह कर देते हैं। पिता की हत्या, बहनों पर अत्याचार और छोटी बहन के अपहरण जैसी घटनाएं उसके जीवन को बदल देती हैं। इसके बाद जस्सी न्याय की प्रतीक्षा छोड़ प्रतिशोध का रास्ता चुन लेता है।

फिल्म में हिंसा के अनेक दृश्य हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल रोमांच पैदा करना नहीं, बल्कि उस मानसिक स्थिति को दिखाना है जिसमें एक व्यक्ति अपने भीतर बची हुई संवेदनाओं को खो देता है।

फिल्म का सबसे भावुक दृश्य तब सामने आता है, जब जस्सी अपनी बंधक बनाई गई छोटी बहन तक पहुंचता है। भाई को देखते ही बहन की आंखों से छलकता दर्द और टूटता हुआ साहस उस पीड़ा को व्यक्त कर देता है, जिसके लिए किसी संवाद की आवश्यकता नहीं पड़ती।

इसी तरह अदालत से बाहर निकलने के बाद जस्सी का अपनी मां से कहना—"फौज में मरता तो शहीद कहलाता"—और मां का उसे गले लगाकर "मेरा फौजी बच्चा" कहना फिल्म के सबसे मार्मिक क्षणों में शामिल है। यह दृश्य बताता है कि कानून का फैसला अपनी जगह है, लेकिन एक मां की नजर में उसका बेटा अब भी वही बच्चा है जिसे उसने संस्कारों के साथ बड़ा किया था।

जब व्यवस्था पर भरोसा टूटने लगे

दूसरी ओर 'Citizen Vigilante' न्याय व्यवस्था से उपजी निराशा को एक अलग सामाजिक संदर्भ में प्रस्तुत करती है।

कहानी एक नाबालिग पीड़िता के साथ हुए गंभीर अपराध से शुरू होती है। जब न्याय व्यवस्था अपराधियों को सुधार का अवसर देती है, तब फिल्म का मुख्य पात्र स्वयं न्याय करने का निर्णय लेता है।

फिल्म केवल अपराधियों पर ही प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि अपराध, पारिवारिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व, प्रवासन और सांस्कृतिक टकराव जैसे विषयों पर भी चर्चा करती है।

हालांकि फिल्म का वैचारिक दृष्टिकोण स्पष्ट और कई बार विवादास्पद माना गया है। अनेक समीक्षकों ने इसे एकतरफा भी बताया, लेकिन यह पश्चिमी समाज के उस वर्ग की बेचैनी को सामने लाती है जो अपराध और न्याय व्यवस्था को लेकर लगातार असंतोष महसूस करता है।

सिनेमा का प्रश्न, समाज का उत्तर

इन दोनों फिल्मों की सबसे बड़ी समानता यह है कि इनके नायक स्वयं को व्यवस्था के सामने असहाय महसूस करते हैं। जब संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होने लगता है, तब प्रतिशोध उन्हें न्याय का विकल्प दिखाई देने लगता है। यही कारण है कि दर्शक कई बार पात्रों के दर्द और क्रोध को समझ लेता है, भले ही उनके अपनाए गए तरीकों से सहमत न हो।

सिनेमा का उद्देश्य केवल समाधान प्रस्तुत करना नहीं होता। उसका एक महत्वपूर्ण दायित्व समाज के सामने कठिन और असहज प्रश्न रखना भी है। 'धुरंधर' और 'Citizen Vigilante' इसी भूमिका को निभाती हैं। ये फिल्में दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि न्याय केवल अदालतों का विषय नहीं, बल्कि समाज के नैतिक विश्वास और संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।

प्रतिशोध पर आधारित कहानियां सदैव लोगों को आकर्षित करती रही हैं, क्योंकि वे मनुष्य की सबसे तीव्र भावनाओं—दर्द, अपमान, क्रोध और न्याय की आकांक्षा—को एक साथ सामने लाती हैं।

लेकिन वास्तविक जीवन में न्याय और प्रतिशोध के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना ही किसी भी सभ्य समाज की पहचान है।

इसीलिए ऐसी फिल्मों को केवल एक्शन या हिंसा के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि उस सामाजिक मनोविज्ञान के दस्तावेज़ के रूप में भी देखा जाना चाहिए, जो व्यवस्था से निराश लोगों के मन में उठ रहे सवालों, असुरक्षाओं और आक्रोश को अभिव्यक्ति देता है।

लेखक

कैलाश चंद्र

सामाजिक कार्यकर्ता / स्तभंकार

लेखक

बस्तर संवाददाता

इस लेखक की सभी ख़बरें

और भी पढ़ें