बस्तर के घने जंगलों में कभी गोलियों की गूंज सुनाई देती थी। दशकों तक नक्सल हिंसा की वजह से अबूझमाड़ देश के सबसे दुर्गम और रहस्यमयी क्षेत्रों में गिना जाता रहा। लेकिन आज जब यहां शांति की नई सुबह दिखाई दे रही है, तब एक नया खतरा इस जंगल की जड़ों तक पहुंच चुका है। यह खतरा बंदूकों का नहीं, बल्कि कुल्हाड़ियों और मशीनों का है।
नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरों में से एक है। लगभग 5000 वर्ग किलोमीटर में फैला यह विशाल वन क्षेत्र देश के सबसे बड़े प्राकृतिक ऑक्सीजन बैंकों में गिना जाता है। यहां के घने जंगल न केवल जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका, संस्कृति और जीवन का आधार भी हैं।
लेकिन इन दिनों अबूझमाड़ के जंगल एक नए संकट का सामना कर रहे हैं। सड़क निर्माण, खेती के विस्तार, अतिक्रमण और अवैध कटाई के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों को काटे जाने की खबरें सामने आ रही हैं। आधुनिक जेसीबी, डोजर और भारी मशीनों की मदद से जंगलों को साफ किया जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का दावा है कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका तो आने वाले वर्षों में अबूझमाड़ की हरियाली केवल इतिहास बनकर रह जाएगी।
अफवाह बनी जंगलों की दुश्मन
ग्रामीण क्षेत्रों में एक चर्चा तेजी से फैल रही है कि यदि जंगल काटकर खेती शुरू कर दी जाए तो भविष्य में उस जमीन का पट्टा मिल सकता है। इसी भ्रम ने कई लोगों को जंगलों की ओर धकेल दिया है।
हालांकि वन अधिकार कानून की वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। कानून केवल दिसंबर 2005 या उससे पहले के कब्जों को ही मान्यता देता है। वर्तमान में जंगल काटकर कब्जा करने वालों को किसी प्रकार का कानूनी अधिकार मिलने की संभावना नहीं है। इसके बावजूद अफवाहों ने जंगलों पर दबाव बढ़ा दिया है।
भारत के फेफड़े क्यों है अबूझमाड़?
पर्यावरण विशेषज्ञ अबूझमाड़ को "भारत के फेफड़े" कहते हैं। इसके पीछे मजबूत कारण हैं। यह विशाल वन क्षेत्र बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित रखता है।
यहीं पर जंगली भैंसा, बाघ, तेंदुआ, भालू और अनेक दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास मौजूद है। जंगलों का यह नेटवर्क बस्तर के जल स्रोतों को जीवित रखता है और पूरे क्षेत्र के तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चिंता की बात यह है कि इस वर्ष अबूझमाड़ का तापमान 43 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। विशेषज्ञ इसे बदलते पर्यावरणीय संकेतों के रूप में देख रहे हैं।
सर्वेक्षण से पहले वन विनाश का खतरा
अबूझमाड़ की एक और विशेषता यह है कि आज तक इसका पूर्ण भूमि सर्वेक्षण नहीं हो पाया है। वर्तमान में सर्वेक्षण की प्रक्रिया जारी है। ऐसे समय में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और भूमि परिवर्तन भविष्य में गंभीर कानूनी विवादों और पर्यावरणीय चुनौतियों को जन्म दे सकते हैं।
स्थिति को और गंभीर बनाता है वन विभाग में कर्मचारियों की कमी। कई संवेदनशील क्षेत्रों में रेंजर, डिप्टी रेंजर और वनरक्षक तक पदस्थ नहीं हैं। निगरानी कमजोर होने का फायदा अवैध कटाई करने वाले उठा रहे हैं।
विकास और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी
सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी सुविधाएं हर क्षेत्र तक पहुंचनी चाहिए। विकास की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन विकास की कीमत जंगलों के विनाश के रूप में चुकाना भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
अबूझमाड़ केवल पेड़ों का समूह नहीं है। यह बस्तर की पहचान है, हजारों आदिवासी परिवारों की जीवनरेखा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की अमूल्य धरोहर है।
क्या किए जा सकते हैं बड़े कदम?
- भूमि सर्वेक्षण पूरा होने तक बड़े पैमाने की कटाई पर रोक लगाई जाए।
- वन अधिकार कानून की सही जानकारी गांव-गांव तक पहुंचाई जाए।
- वन विभाग की रिक्तियों को जल्द भरा जाए।
- अवैध कटाई रोकने के लिए विशेष निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।
- स्थानीय समुदायों को संरक्षण अभियान से जोड़ा जाए।
जंगल बचेंगे, तभी भविष्य बचेगा
दशकों तक संघर्ष और हिंसा झेलने के बाद अबूझमाड़ में शांति की किरण दिखाई दे रही है। लेकिन यदि इसी दौर में जंगल खत्म होने लगे तो यह विकास नहीं, बल्कि भविष्य के साथ समझौता होगा।
आज जरूरत केवल सरकारी कार्रवाई की नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी की है। क्योंकि अबूझमाड़ का हरा दिल धड़कता रहेगा, तभी बस्तर की पहचान, पर्यावरण का संतुलन और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।