जगदलपुर। कभी जंगलों में बंदूक के साये में जीवन बिताने वाले आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों की जिंदगी अब नई दिशा में आगे बढ़ रही है। नक्सलवाद की राह छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे इन युवाओं के लिए अब परिवार बसाने, शादी करने और माता-पिता बनने के सपने साकार हो रहे हैं। बस्तर में चलाए जा रहे विशेष रिवर्स वासेक्टॉमी (नसबंदी पुनर्स्थापन) अभियान ने कई पूर्व नक्सलियों के जीवन में नई उम्मीद जगाई है।
नक्सली संगठन में शादी और परिवार पर था प्रतिबंध
नक्सली संगठनों में वर्षों तक सक्रिय रहे कई पुरुष कैडरों की जबरन नसबंदी कराई गई थी। संगठन के भीतर प्रेम, विवाह और पारिवारिक जीवन पर सख्त प्रतिबंध था। नक्सली नेतृत्व को आशंका रहती थी कि यदि कैडर परिवार और बच्चों से जुड़ेंगे तो संगठन छोड़ सकते हैं।
इसी कारण कई युवाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध पितृत्व के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया था। लेकिन अब आत्मसमर्पण के बाद वही युवा सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं।
ढाई माह में 73 पूर्व नक्सलियों की सफल सर्जरी
जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के संयुक्त प्रयास से जगदलपुर के महारानी अस्पताल में विशेष रिवर्स वासेक्टॉमी शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में मुंबई, रायपुर और अन्य शहरों के विशेषज्ञ यूरोलॉजिस्ट एवं माइक्रोसर्जन शामिल हुए।
यूरोलॉजिकल सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. राजेश कुकरेजा के अनुसार पहले चरण में 33 और दूसरे चरण में 40 पूर्व नक्सलियों की सफल सर्जरी की गई। इस तरह ढाई माह के भीतर कुल 73 लोगों को इस सुविधा का लाभ मिला।
दुनिया की जटिल माइक्रोसर्जरी में शामिल है प्रक्रिया
रिवर्स वासेक्टॉमी एक अत्यंत जटिल माइक्रोसर्जिकल प्रक्रिया है। इसमें नसबंदी के दौरान काटी गई शुक्रवाहिकाओं (Vas Deferens) को दोबारा जोड़ा जाता है ताकि व्यक्ति पुनः प्राकृतिक रूप से पिता बनने में सक्षम हो सके।
विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑपरेशन अत्यधिक सूक्ष्मता और विशेषज्ञता की मांग करता है, लेकिन सफल होने पर यह व्यक्ति के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।
दो माह की बच्ची का पिता बना पूर्व नक्सली
इस अभियान के सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। एक वर्ष पहले रिवर्स वासेक्टॉमी करवाने वाला एक आत्मसमर्पित पूर्व नक्सली हाल ही में दो माह की बच्ची का पिता बना है। यह सफलता उन अनेक युवाओं के लिए उम्मीद का संदेश है जो अपने परिवार और बच्चों का सपना देख रहे हैं।
बंदूक से सिंदूर तक का सफर
हाल ही में जगदलपुर के टाउन हॉल में आयोजित मुख्यमंत्री कन्यादान विवाह समारोह में दो आत्मसमर्पित नक्सली जोड़े सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह बंधन में बंधे। जिन हाथों में कभी बंदूक थी, उन्हीं हाथों से उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी की मांग में सिंदूर भरा।
प्रशासन अब अन्य इच्छुक पूर्व नक्सली जोड़ों के लिए भी सामूहिक विवाह कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी कर रहा है।
पुनर्वास का मानवीय मॉडल
प्रशासन का मानना है कि पुनर्वास केवल आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि लोगों को सम्मानजनक सामाजिक जीवन, परिवार और बेहतर भविष्य का अवसर भी मिलना चाहिए। रिवर्स वासेक्टॉमी अभियान इसी सोच का हिस्सा है।
बस्तर में यह पहल साबित कर रही है कि सही अवसर और संवेदनशील प्रयासों से भटके हुए लोगों को भी समाज का सक्रिय और सम्मानित नागरिक बनाया जा सकता है।