शहरों की तरफ पलायन और तकनीकी बदलाव के बावजूद बस्तर के युवा अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। सोशल मीडिया, यू-ट्यूब और स्थानीय आयोजनों के जरिये वे अपनी संस्कृति को नए दर्शकों तक पहुँचा रहे हैं।
हल्बी, गोंडी और भतरी जैसी स्थानीय भाषाओं में बने वीडियो, गीत और कविताएँ इस आंदोलन का हिस्सा हैं। पारंपरिक नृत्यों को आज के संगीत के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है।
यह जुड़ाव आने वाले दशकों में बस्तर की पहचान को और मजबूत करेगा और वैश्विक मंच पर इसे एक विशिष्ट स्थान दिलाएगा।