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धार्मिक आस्थाएँ 31 मई 2026 3 मिनट का पठन 31 मई 2026

रमोतीन माड़िया: साहस, संघर्ष और शहादत की गाथा

अपडेट किया गया: 31 मई 2026

बस्तर की धरती ने अनेक वीरों और वीरांगनाओं को जन्म दिया है, जिनमें रमोतीन माड़िया का नाम साहस और बलिदान का प्रतीक है।

रमोतीन माड़िया: साहस, संघर्ष और शहादत की गाथा

जब जंगल की बेटी बनी क्रांति की मशाल

बस्तर की धरती सदियों से वीरों और बलिदानियों की जननी रही है। यहां के घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और बहती नदियों ने अनेक संघर्षों की कहानियों को अपने भीतर समेट रखा है। इन्हीं कहानियों में एक नाम ऐसा भी है, जिसे इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह वास्तविक हकदार थी। यह कहानी है बस्तर की महान वीरांगना रमोतीन माड़िया की, जिसने अंग्रेजों और मराठों के अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाकर स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

परलकोट की राजकुमारी, जिसने चुना संघर्ष का रास्ता

आज से दो सौ वर्ष पहले जब बस्तर का परलकोट क्षेत्र अंग्रेजी और मराठा शासन के शोषण से कराह रहा था, तब बारकोट तालुका के तालुकेदार चैनसिंह की बेटी रमोतीन माड़िया अपने आसपास हो रहे अन्याय को देख रही थीं।

जंगलों के असली मालिक आदिवासियों से उनके अधिकार छीने जा रहे थे। जबरन कर वसूली, लूट-खसोट और अत्याचार आम बात बन चुकी थी। ऐसे समय में परलकोट विद्रोह के महानायक शहीद गेदसिंह ने विद्रोह का बिगुल फूंका। इस संघर्ष में रमोतीन माड़िया केवल एक समर्थक नहीं थीं, बल्कि वे इस आंदोलन की मजबूत स्तंभ बनकर उभरीं।

महिलाओं की सेना खड़ी कर दी

उस दौर में जब महिलाओं को युद्ध और राजनीति से दूर रखा जाता था, रमोतीन माड़िया ने समाज की परंपराओं को चुनौती दी। उन्होंने गांव-गांव जाकर माड़िया महिलाओं को संगठित किया और उन्हें समझाया कि यह लड़ाई केवल पुरुषों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की लड़ाई है।

धीरे-धीरे सैकड़ों महिलाएं उनके नेतृत्व में जुड़ गईं। इन महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों और मराठों के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया।

छापामार युद्ध से दुश्मनों में फैला भय

रमोतीन माड़िया की सबसे बड़ी ताकत उनकी रणनीति थी। वे जानती थीं कि आधुनिक हथियारों से लैस दुश्मन सेना का सामना खुले मैदान में करना मुश्किल होगा।

उन्होंने जंगलों को अपना किला बना लिया।

घने जंगलों के बीच छिपकर माड़िया योद्धा अचानक हमला करते और फिर जंगलों में गायब हो जाते। यह छापामार युद्ध शैली अंग्रेजों और मराठों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई।

कहा जाता है कि रमोतीन माड़िया इतनी साहसी और निडर थीं कि उनकी वीरता देखकर अंग्रेज अधिकारी भी हैरान रह जाते थे। उनके नेतृत्व और संगठन क्षमता ने विद्रोह को नई ताकत प्रदान की।

गेदसिंह और रमोतीन की जोड़ी बनी प्रतिरोध का प्रतीक

परलकोट विद्रोह केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि आदिवासी अस्मिता और स्वाभिमान की लड़ाई थी। गेदसिंह के नेतृत्व और रमोतीन माड़िया के संगठन कौशल ने हजारों आदिवासियों को एकजुट कर दिया।

दोनों ने मिलकर अंग्रेजों और मराठों की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ जनआंदोलन खड़ा किया। उनके संघर्ष ने बस्तर के लोगों में स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की नई चेतना पैदा की।

रणभूमि में लड़ते-लड़ते हो गईं शहीद

विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों और मराठों ने पूरी ताकत झोंक दी। लेकिन रमोतीन माड़िया पीछे हटने वालों में नहीं थीं।

वे अंतिम समय तक अपने साथियों के साथ रणभूमि में डटी रहीं। दुश्मनों के हमलों का मुकाबला करते हुए उन्होंने वीरतापूर्वक युद्ध किया।

आखिरकार मातृभूमि की रक्षा करते हुए यह महान वीरांगना रणभूमि में ही शहीद हो गईं। लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनकी शहादत ने आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी।

आज भी जीवित है उनकी विरासत

रमोतीन माड़िया के साहस और बलिदान को सम्मान देने के लिए नारायणपुर स्थित शासकीय महिला महाविद्यालय का नाम बदलकर "वीरांगना रमोतीन माड़िया शासकीय महिला महाविद्यालय, नारायणपुर" रखा गया है।

महाविद्यालय परिसर में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गई है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके संघर्ष और बलिदान की याद दिलाती है।

इतिहास के पन्नों से निकलकर जन-जन तक पहुंचनी चाहिए यह कहानी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा जब भी होती है, तब अक्सर बड़े शहरों और प्रसिद्ध नेताओं के नाम सामने आते हैं। लेकिन बस्तर के जंगलों में भी ऐसी वीरांगनाएं थीं जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता की नींव मजबूत की।

रमोतीन माड़िया ऐसी ही एक महान नायिका थीं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि साहस किसी पद या शक्ति का मोहताज नहीं होता। यदि इरादे मजबूत हों तो जंगलों की बेटियां भी साम्राज्यों को चुनौती दे सकती हैं।

रमोतीन माड़िया केवल बस्तर की नहीं, बल्कि पूरे भारत की गौरवगाथा हैं। उनका नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाना चाहिए।


लेखक

बस्तर संवाददाता

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