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धार्मिक आस्थाएँ 25 मई 2026 3 मिनट का पठन 25 मई 2026

जहां पूरा गांव उतरता है तालाब में कोंडागांव का ऐतिहासिक बंधा मतौर उत्सव

अपडेट किया गया: 25 मई 2026

बरकई गांव में हुआ ‘बंधा मतौर’ का आयोजन, हजारों ग्रामीणों ने पकड़ी सामूहिक मछली जहां पूरा गांव उतरता है तालाब में कोंडागांव का ऐतिहासिक ‘बंधा मतौर’ उत्सव

जहां पूरा गांव उतरता है तालाब में कोंडागांव का ऐतिहासिक बंधा मतौर उत्सव

ग्राम देवी की पूजा-अर्चना के बाद तालाब में उतरे ग्रामीण, जीवंत हुई बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा

बरकई गांव में आयोजित होने वाला पारंपरिक ‘बंधा मतौर’ उत्सव एक बार फिर ग्रामीण संस्कृति, सामूहिकता और लोक आस्था का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। कोंडागांव जिले के इस गांव में हजारों की संख्या में ग्रामीण एक साथ तालाब में उतरकर पारंपरिक तरीके से मछली पकड़ते हैं। हर तीन वर्ष में आयोजित होने वाला यह आयोजन अब बस्तर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुआ आयोजन

कार्यक्रम की शुरुआत गांव के मालगुजार, पुजारी और पटेल द्वारा ग्राम देवी की पूजा-अर्चना से हुई। पूजा के बाद जैसे ही ढोल-नगाड़ों की गूंज पूरे गांव में सुनाई दी, तालाब में मौजूद मछलियां पानी में उछलती दिखाई देने लगीं। इस दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचे थे।

ग्रामीणों का मानना है कि यह केवल मछली पकड़ने का आयोजन नहीं, बल्कि ग्राम देवी के प्रति श्रद्धा, सामुदायिक एकता और परंपरा के संरक्षण का प्रतीक है।

दशकों पुरानी है ‘बंधा मतौर’ की परंपरा

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, वर्षों पहले गांव के तत्कालीन मालगुजारों ने ग्रामीणों के श्रमदान से एक बड़े तालाब का निर्माण करवाया था। तालाब बनने के बाद निर्णय लिया गया कि हर तीन वर्ष में एक बार तालाब की सभी मछलियां गांववासियों को सामूहिक रूप से दी जाएंगी। तभी से ‘बंधा मतौर’ की यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है।

निर्धारित समय आने पर गांव के लोग मालगुजार का बाजे-गाजे के साथ स्वागत करते हैं और उन्हें तालाब तक लेकर जाते हैं। मालगुजार द्वारा पूजा-अर्चना कर तालाब के पानी को स्पर्श करने के बाद हजारों ग्रामीण एक साथ तालाब में उतरते हैं और पारंपरिक तरीके से मछलियां पकड़ते हैं।

बस्तर की लोकसंस्कृति और सामुदायिक जीवन की मिसाल

‘बंधा मतौर’ केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर के सामुदायिक जीवन और लोकसंस्कृति की अनूठी मिसाल है। यहां जाति, वर्ग और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर पूरा गांव एक साथ इस आयोजन में शामिल होता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा गांव में आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता को मजबूत करती है।

विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर संभाग की कई पारंपरिक लोक परंपराएं प्रकृति, जल स्रोतों और सामुदायिक जीवन से जुड़ी रही हैं। ‘बंधा मतौर’ भी उन्हीं परंपराओं में से एक है, जो जल संरक्षण, सामूहिक श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के साझा उपयोग की भावना को दर्शाती है।

बढ़ रही है आयोजन की पहचान

स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में इस आयोजन की पहचान तेजी से बढ़ी है। इस बार बड़ी संख्या में लोग आयोजन को देखने पहुंचे, जिसके कारण गांव में उत्सव जैसा माहौल बना रहा। हजारों ग्रामीण तालाब में उतरकर मछलियां पकड़ते नजर आए और पकड़ी गई मछलियां अपने घर लेकर गए।

आयोजन समिति ने जानकारी दी कि आने वाले वर्षों में इस पारंपरिक उत्सव को और अधिक भव्य रूप देने की तैयारी की जाएगी, ताकि बस्तर की इस सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सके।

धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण समापन

कार्यक्रम के अंत में गांव के मालगुजार द्वारा तालाब के पानी को पुनः स्पर्श कर ‘बंधा मतौर’ के समापन की घोषणा की जाती है। ग्रामीण इस क्षण को आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक पल मानते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बदलते समय में भी बरकई गांव ने अपनी परंपरा और संस्कृति को जीवित रखा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय है।

लेखक

बस्तर संवाददाता

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