पेन पुंगार देव फूल हजारी फूल - संस्कृति और आस्था का प्रतीक
बस्तर की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर में हजारी फूल का विशेष स्थान है। यह फूल न केवल अपनी सुंदरता और सुगंध के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। बस्तर के देवी-देवताओं की सेवा अर्जी में हाजरी फूल का उपयोग किया जाता है और इसके बिना सेवा अर्जी अधूरी मानी जाती है।
हजारी फूल का ऐतिहासिक महत्व
ऐसा कहा जाता है कि बस्तर में यह फूल पहले नहीं पाया जाता था। बस्तर के राजा इसकी मोहक सुगंध और आकर्षक रूप से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे परलकोट से एक हजार कौड़ियों में खरीदकर बस्तर में लाया। इसी कारण इसे "हजारी फूल" या "देव फूल" कहा जाता है। इस फूल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व इतना अधिक है कि इसे विशेष अवसरों और त्योहारों पर ही उपयोग में लाया जाता है।
दशहरा और अन्य पर्वों में देव फूल की भूमिका
बस्तर का दशहरा पूरे भारत में प्रसिद्ध है और इसमें हजारी फूल की अहम भूमिका होती है। दशहरा वन में जब विशेष प्रकार के पौधे लगाए जाते हैं, तब हजारी फूल भी उनमें शामिल होता है। यह फूल बस्तर के विभिन्न मेले-मड़ाई में भी पूजनीय होता है। स्थानीय त्योहारों में इस फूल की मांग बहुत अधिक होती है और इसकी कीमत भी बढ़ जाती है।
पेन पुंगार का प्राकृतिक सौंदर्य और उपयोग
यह फूल बारहों महीने खिलता है और अत्यंत सुंदर दिखता है। इसकी सुगंध इतनी मनमोहक होती है कि इसके पास बैठने से मन को शांति और सुकून का अनुभव होता है। बस्तर के लोग इसे "पेन पुरखों की सेवा अर्जी" के रूप में भी उपयोग करते हैं।
संरक्षण और महत्व
आज के समय में, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण कई वनस्पतियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। हजारी फूल को संरक्षित करना आवश्यक है ताकि बस्तर की यह अनमोल धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक बनी रहे। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं में इसका जो महत्व है, वह इसे और भी विशेष बना देता है।
हजारी फूल न केवल एक पुष्प है, बल्कि बस्तर की आस्था, परंपरा और प्रकृति से जुड़ी हुई एक अनमोल धरोहर भी है।