बस्तर जिले के तिरिया माचकोट रेंज अंतर्गत तोलावाड़ा के घने जंगलों में खड़े चार विशालकाय सागौन वृक्ष सदियों से प्रकृति, संस्कृति और आस्था के प्रतीक बने हुए हैं। स्थानीय लोग इन्हें राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के नाम से जानते हैं और श्रद्धा के साथ उनकी पूजा करते हैं। लगभग 450 से 500 वर्ष पुराने माने जाने वाले ये वृक्ष अब उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं। इनमें से भरत वृक्ष पूरी तरह सूख चुका है, जबकि राम और लक्ष्मण वृक्ष भी धीरे-धीरे सूखने की स्थिति में पहुंच रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अत्यधिक उम्र और दीमकों के बढ़ते प्रकोप ने इन वृक्षों की जीवन क्षमता को प्रभावित किया है।
वैज्ञानिकों और वन विभाग की संयुक्त पहल
इन ऐतिहासिक वृक्षों को बचाने के लिए वन विभाग ने विशेष रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया है। वन मंडलाधिकारी उत्तम कुमार गुप्ता के अनुसार, दीमकों के प्रभाव को कम करने और जीवित छाल को सुरक्षित रखने के लिए तनों पर चूना और कॉपर सल्फेट का विशेष लेप लगाया जा रहा है। भीषण गर्मी से बचाने के लिए वृक्षों के आसपास गहरी गोलाकार खाइयां बनाई गई हैं, जिनमें नियमित रूप से पानी भरकर जड़ों तक नमी पहुंचाई जा रही है। इससे वृक्षों पर पड़ने वाले वॉटर स्ट्रेस को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
टिश्यू कल्चर से संरक्षित होगी विरासत
वन विभाग इन वृक्षों की आनुवंशिक विरासत को संरक्षित करने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा ले रहा है। विशेषज्ञ इन वृक्षों के शीर्ष भाग और नोडल सेगमेंट लेकर टिश्यू कल्चर तकनीक के माध्यम से नए पौधे तैयार कर रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य इन दुर्लभ और ऐतिहासिक सागौन वृक्षों की अगली पीढ़ी तैयार करना है, ताकि उनकी आनुवंशिक विशेषताएं भविष्य में भी संरक्षित रह सकें।
जलवायु इतिहास का भी मिलेगा दस्तावेज
सूख चुके भरत वृक्ष के तने और उसके क्रॉस-सेक्शन को सुरक्षित रखने की योजना बनाई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वृक्ष के भीतर मौजूद वार्षिक वलय (Annual Rings) पिछले 500 वर्षों के जलवायु परिवर्तन, वर्षा और सूखे के चक्रों का महत्वपूर्ण रिकॉर्ड प्रस्तुत कर सकते हैं। इसे भविष्य में शोध और सार्वजनिक प्रदर्शनी के लिए संरक्षित किया जाएगा, जिससे पर्यावरण और इतिहास से जुड़े अध्ययन को नई दिशा मिल सके।
ग्रामीणों की आस्था का केंद्र
तोलावाड़ा के ये चारों वृक्ष केवल वन संपदा नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी हैं। आदिवासी समाज प्रमुख प्रकाश ठाकुर का कहना है कि वर्षों से ग्रामीण इन वृक्षों की पूजा करते आ रहे हैं और इन्हें जीवित धरोहर मानते हैं। उन्होंने वन विभाग से इन वृक्षों के संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास करने की अपील की है।