प्रकृति प्रदत्त फसलों के आगमन और उनके सम्मान का यह महान पर्व आज भी आदिवासी एवं बानी बिरादरी समुदायों द्वारा विभिन्न पेन नार, जागा, गढ़ और मण्डाओं में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
मरका पंडुम केवल आम का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति सम्मान, मौसमी परिवर्तन की स्वीकृति और पारिस्थितिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। आदिवासी एवं बानी बिरादरी समुदाय के लिए प्रकृति कोई विचार मात्र नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। पेड़, जंगल, नदियाँ, पहाड़ और फल इनके लिए व्यापार की वस्तुएँ नहीं, बल्कि मित्र, संरक्षक और जीविका के स्रोत हैं।
हर वृक्ष का अपना महत्व है, हर फल की अपनी कहानी है और मरका पंडुम उन अनेक पर्वों में से एक है, जहाँ जंगल के फलों का उत्सव मनाया जाता है, उनका सम्मान किया जाता है और उनके संरक्षण का संकल्प लिया जाता है।
प्रकृति के साथ मानवता का संतुलित विकास
मानवता का लक्ष्य केवल तकनीक के माध्यम से प्रकृति को कुचलकर अपनी महत्वाकांक्षाओं को आकार देना नहीं होना चाहिए। वास्तविक लक्ष्य प्रकृति के साथ मानवीय गुणों का विकास करना है, क्योंकि प्रकृति खुशहाल रहेगी तभी मानवता भी प्रफुल्लित रहेगी।
मरका पंडुम इसी मूल संदेश का वाहक है। जनजातीय समुदायों का जीवन-दर्शन आज के अति-उपभोगवादी और पर्यावरणीय संकट से जूझते विश्व के सामने एक बेहतर विकल्प और उम्मीद प्रस्तुत करता है।
पंडुम : केवल उत्सव नहीं, एक वैज्ञानिक प्रक्रिया
सामान्यतः पंडुम का अर्थ त्यौहार या उत्सव माना जाता है, जबकि आदिवासी समुदाय में पंडुम का अर्थ कहीं अधिक व्यापक और गहन है।
आदिवासी समाज के लिए पंडुम केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और अनुकूल बनाए रखने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
गोंडी भाषा में "पंडुम" शब्द "पंडना" से बना है, जिसका अर्थ है – बनाना, सुरक्षित रखना और आगे बढ़ाना। अर्थात ऐसी परंपराओं को संरक्षित रखना जो प्रकृति और मानव समुदाय दोनों के लिए कल्याणकारी हों।
मरका पंडुम का वैज्ञानिक आधार
मरका अर्थात आम का फल।
आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय किसी भी प्राकृतिक उपज का उपयोग तब तक प्रारंभ नहीं करते, जब तक वह पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं हो जाती।
मरका पंडुम में आम के फल का सेवन तभी प्रारंभ किया जाता है, जब उसके भीतर का बीज पूर्ण विकसित हो जाता है और वह अगली पीढ़ी के लिए अंकुरित होने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
उसके बाद सर्वप्रथम इस ज्ञान को देने वाले पूर्वजों, पेन्क, देवी-देवताओं, बूढ़ालपेन और प्रकृतिपेन को आम अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात ही पूरा समुदाय एक साथ आम का सेवन प्रारंभ करता है।
इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक कारण है। यदि कच्चे और अपरिपक्व फलों का अत्यधिक उपयोग किया जाए तो बीज विकसित नहीं हो पाएंगे और नई पीढ़ी के पौधे तैयार नहीं होंगे। परिणामस्वरूप भविष्य में उस प्रजाति का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।
यही कारण है कि जनजातीय समुदाय हजारों वर्षों से प्रकृति संरक्षण की इस व्यवस्था को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
कोयापुनेम : ज्ञान की ओर सतत प्रवाह
कोयतोर समुदाय इस जीवन-दर्शन को "कोयापुनेम" कहता है।
"पून" का अर्थ है – ज्ञान, जानना।
"नेम" का अर्थ है – उसकी ओर बढ़ना।
अर्थात ज्ञान की ओर सतत प्रवाहित होने वाला समुदाय।
यही पुनेमी ज्ञान पंडुमों के माध्यम से व्यवहारिक रूप में समाज तक पहुँचता है और नई पीढ़ियों को हस्तांतरित होता है।
कोको पंडिग पाटा : नियंत्रित उपभोग का संदेश
मरका पंडुम में एक विशेष गीत गाया जाता है जिसे "कोको पंडिग पाटा" कहा जाता है।
यह गीत गोटूल के लया-लयोर (युवक-युवतियों) द्वारा प्रश्न-उत्तर शैली में गाया जाता है।
मरका पंडुम ...... कोको को
रेका पंडुम ...... कोको को
इरूक पंडुम ...... कोको को
तुमीर काया ...... कोको को
कोहका काया ...... कोको को
गोर्रा पंडुम ...... कोको को
इस गीत का भावार्थ है कि प्रकृति के उपहारों का उपयोग संयम और संतुलन के साथ किया जाए।
"कोको को" का अर्थ है – मुर्गे की तरह थोड़ा-थोड़ा करके खाना।
यह संदेश देता है कि फलों का उपभोग नियंत्रित हो ताकि पर्याप्त फल प्राकृतिक रूप से पककर बीज तैयार कर सकें और नए पौधों का जन्म हो सके।
स्वास्थ्य और प्रकृति संरक्षण का अद्भुत संगम
मरका पंडुम केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
आदिवासी समाज में पूर्वजों को अर्पण करने से पहले फल खाने की मनाही होती है। इसके कारण बच्चे भी कच्चे फलों का सेवन नहीं करते।
कच्चे आमों में मौजूद अम्लीय तत्व बच्चों के मुंह में छाले, घाव और संक्रमण का कारण बन सकते हैं। लेकिन पंडुम में निहित परंपराएँ बच्चों को इन स्वास्थ्य जोखिमों से भी बचाती हैं।
पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता की अद्भुत परंपरा
सदियों से आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय केवल पूरी तरह पके हुए फलों का सेवन करते हैं और पर्याप्त फलों को प्राकृतिक रूप से पकने के लिए छोड़ देते हैं।
इससे बीज परिपक्व होते हैं, नए पौधे विकसित होते हैं और जंगल निरंतर पुनर्जीवित होते रहते हैं।
यही कारण है कि आज भी अनेक आदिवासी क्षेत्रों में बिना किसी बड़े सरकारी तंत्र के प्राकृतिक रूप से पौधों की नई पीढ़ियाँ विकसित होती रहती हैं।
प्रकृति के बाद यदि कोई दूसरा शिक्षक है...
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन में कहा था
"प्रकृति से बेहतर कोई शिक्षक इस दुनिया में नहीं हो सकता और आदिवासी से बेहतर कोई शिक्षक इस दुनिया में नहीं हो सकता।"
प्रकृति के बाद यदि कोई दूसरा शिक्षक है, तो वह आदिवासी समाज है।
क्योंकि आदिवासी और बानी बिरादरी समुदाय वास्तव में प्रकृति के महान रक्षक हैं। इनके पंडुमों में इस पृथ्वी पर जीवन की अनंत संभावनाओं को सुरक्षित रखने की व्यवस्था समाहित है।
मरका पंडुम केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, मानवता, विज्ञान, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी का जीवंत दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि विकास और प्रकृति संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते हम प्रकृति को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन के आधार के रूप में स्वीकार करें।