गांव की खुशहाली के लिए सरहद पार छोड़े जाते हैं क्लेश, जानिए बीजापुर की सदियों पुरानी गम्पा जातरा की अनूठी परंपरा
बीजापुर। बस्तर की धरती केवल घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी जनजातीय परंपराओं और लोक आस्थाओं के लिए भी जानी जाती है। इन्हीं जीवंत परंपराओं में एक है बीजापुर जिले के ग्राम पंचायत मददेड़ में मनाया जाने वाला गम्पा जातरा (गाम देवी जातरा) महापर्व, जहां हर वर्ष ग्रामीण अपने घरों के क्लेश, दुख और नकारात्मकता को प्रतीकात्मक रूप से गांव की सरहद के बाहर छोड़कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।
यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की एकता, सामूहिक भागीदारी और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का अद्भुत उदाहरण भी है।
वर्षा ऋतु से पहले क्यों मनाई जाती है गम्पा जातरा?
मद्देड़ गांव में यह पारंपरिक पर्व हर वर्ष वर्षा ऋतु के आगमन से पहले आयोजित किया जाता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि माता की पूजा-अर्चना से अच्छी वर्षा होती है, खेती-किसानी सफल रहती है और पूरे वर्ष गांव में सुख-शांति बनी रहती है।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी जाति, धर्म या समुदाय का भेदभाव नहीं होता। गांव का हर परिवार अपनी श्रद्धा और सहभागिता के साथ इस आयोजन में शामिल होता है।
पीढ़ियों से जीवित है यह परंपरा
ग्रामीण किस्तेया मोरला बताते हैं कि यह परंपरा उनके जन्म से भी पहले, पूर्वजों के समय से चली आ रही है। आज भी इस महापर्व का पूरा आयोजन गांव के लोगों के स्वैच्छिक सहयोग और जनभागीदारी से होता है। प्रत्येक परिवार अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग देता है, जिससे यह परंपरा आज भी पूरी भव्यता के साथ जीवित है।
मारेयम्मा माता की आराधना
सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण यहां तेलुगु संस्कृति का भी प्रभाव दिखाई देता है। ग्राम देवी को यहां मारेयम्मा माता के रूप में पूजा जाता है। गांव के पारंपरिक पुजारी, जिन्हें स्थानीय भाषा में पेरमा (पेरमेहया) कहा जाता है, विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता की पूजा संपन्न कराते हैं।
ग्रामीण माता से पूरे गांव की खुशहाली, अच्छी फसल, पशुधन की सुरक्षा, रोगों से मुक्ति और समय पर वर्षा की कामना करते हैं।
जब गांव छोड़ देता है अपना क्लेश
गम्पा जातरा की सबसे अनूठी परंपरा है "क्लेश को गांव की सीमा के बाहर छोड़ना।"
मान्यता है कि घर-परिवार की परेशानियां, बीमारी, कलह और नकारात्मक ऊर्जा को प्रतीकात्मक रूप से गांव से बाहर विदा किया जाता है।
इसके लिए प्रत्येक परिवार अपने घर से पुरानी बांस की टोकरी, घिसा हुआ झाड़ू, पुरानी रस्सी, बांस का छोटा टुकड़ा और कपड़े का झंडा लेकर मंदिर पहुंचता है। ये सभी वस्तुएं घर के क्लेश, पीड़ा और दरिद्रता का प्रतीक मानी जाती हैं।
बाजे-गाजे के साथ सरहद तक निकलता है जुलूस
पूजा के बाद इन सभी प्रतीकात्मक वस्तुओं को एकत्र कर पारंपरिक ढोल-नगाड़ों और लोक वाद्यों के साथ जुलूस निकाला जाता है। गांव की सीमा पर दो बांस गाड़कर आम के पत्तों का तोरण बनाया जाता है और पूरे विधि-विधान से इन वस्तुओं को गांव की सरहद के बाहर छोड़ दिया जाता है।
ग्रामीणों का विश्वास है कि इसके बाद गांव में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पातीं और पूरा वर्ष सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहती है।
लोक संस्कृति की अमूल्य विरासत
गम्पा जातरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक संस्कृति, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यह परंपरा बताती है कि भारतीय जनजातीय समाज में लोक आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, पर्यावरण और सामाजिक सद्भाव से गहराई से जुड़ी हुई है।
आज भी मददेड़ गांव इस सदियों पुरानी विरासत को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित रखे हुए है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण उदाहरण है।