सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की तीन-भाषा नीति पर तत्काल रोक लगाने से इंकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी भाषा का अध्ययन कभी व्यर्थ नहीं जाता। हालांकि, नीति के क्रियान्वयन को चुनौती देने वाली नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार, एनसीईआरटी (NCERT) और सीबीएसई से 10 दिनों के भीतर जवाब तलब किया गया है।
मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत लागू की गई इस व्यवस्था पर विस्तृत सुनवाई के बाद ही किसी प्रकार का अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता अमनदीप कौर और अर्पण रॉय चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कक्षा 9वीं के विद्यार्थियों के लिए दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किए जाने के निर्णय को चुनौती दी है। याचिका में केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी को पक्षकार बनाया गया है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर और गोपाल शंकरनारायणन ने अपना पक्ष रखा।
तत्काल रोक लगाने से किया इंकार
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस नीति पर रोक लगाने से साफ इंकार कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी नई भाषा का ज्ञान हमेशा उपयोगी होता है और विस्तृत सुनवाई के बाद ही यह तय किया जाएगा कि नीति पर रोक लगाने की आवश्यकता है या नहीं।
सरकार और CBSE से मांगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी से पूछा है कि देशभर में तीन-भाषा नीति लागू करने के लिए क्या व्यवस्थाएं की गई हैं और इसे प्रभावी ढंग से लागू करने की क्या तैयारी है। सभी पक्षों को 10 दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी।
क्या है CBSE की तीन-भाषा नीति?
सीबीएसई के नए परिपत्र के अनुसार 1 जुलाई से कक्षा 9वीं के विद्यार्थियों के लिए कम से कम दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है।
यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE 2023) के अनुरूप लागू की जा रही है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में बहुभाषी क्षमता विकसित करना और भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना है।