बस्तर खबर
कृषि जगत 17 मई 2026 3 मिनट का पठन 17 मई 2026

Chhattisgarh is becoming a new model of farming

अपडेट किया गया: 17 मई 2026

धान छोड़ “बच” (Sweet Flag) की खेती से किसानों की बदली किस्मत

Chhattisgarh is becoming a new model of farming

कम पानी, कम लागत और लाखों की उम्मीद बना छत्तीसगढ़ मॉडल


छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के जंगलों से घिरे छोटे से गांव राउतमुड़ा में खेती की तस्वीर बदल रही है। जहां पहले किसान पारंपरिक धान की खेती पर निर्भर थे, वहीं अब कई किसान औषधीय फसल “बच” (वचा) (Sweet Flag) की खेती करके नई उम्मीद देख रहे हैं। कम पानी, कम लागत और बेहतर मुनाफे वाली यह खेती अब गांव में चर्चा का विषय बन चुकी है।

धान की खेती में जहां अधिक पानी, खाद, दवाई और मेहनत की जरूरत पड़ती है, वहीं बच की खेती किसानों के लिए राहत लेकर आई है। यही कारण है कि अब गांव के किसान धीरे-धीरे धान छोड़ इस औषधीय खेती की ओर बढ़ रहे हैं।


कैसे शुरू हुई बच की खेती?

गांव के किसानों को एक सामाजिक संस्था और छत्तीसगढ़ वन औषधि बोर्ड के सहयोग से इस खेती की जानकारी मिली। किसानों को एक्सपोजर विजिट पर बागबाहरा ले जाया गया, जहां पहले से बड़े स्तर पर बच (Sweet Flag) की खेती हो रही थी। वहां किसानों ने देखा कि कम लागत में भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।

इसके बाद गांव के 6 किसानों ने पहली बार करीब 4 एकड़ जमीन में बच की खेती शुरू की। किसानों के अनुसार शुरुआत में यह एक प्रयोग जैसा था, लेकिन फसल की स्थिति देखकर अब उन्हें भरोसा हो गया है कि आने वाले वर्षों में इसका रकबा बढ़ेगा।


खेती की प्रक्रिया

फसल 9-10 महीने में तैयार होती है। इसके लिए प्रति एकड़ 20,000 से 25,000 पौधों (स्लिप) की आवश्यकता होती है।


क्या है “बच”(Sweet Flag) फसल?

बच एक औषधीय पौधा है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाइयों में किया जाता है। इसकी जड़ सबसे ज्यादा उपयोगी होती है। सर्दी, खांसी, पाचन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई दवाओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

इस फसल की खास बात यह है कि इसकी जड़ों की सीधी खरीद वन औषधि बोर्ड द्वारा की जाती है। यानी किसानों को बाजार खोजने की परेशानी नहीं होती।


कम लागत, ज्यादा मुनाफा

किसानों के अनुसार आधे एकड़ में लगभग ₹10 हजार तक की लागत आती है। एक एकड़ में करीब 20–25 हजार पौधे लगाए जाते हैं और उत्पादन 15–20 क्विंटल तक पहुंच जाता है।

वन औषधि बोर्ड द्वारा इसका बायबैक अरेंजमेंट भी किया गया है, जिसमें सूखी जड़ों की खरीद ₹70–80 प्रति किलो तक की जाती है। इस हिसाब से किसान एक एकड़ में लगभग ₹1 लाख तक शुद्ध आय कमा सकते हैं।

धान की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि जहां धान में लागत अधिक और मुनाफा सीमित था, वहीं बच की खेती ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।


पानी की बचत बना सबसे बड़ा कारण

धान की खेती पानी पर बहुत ज्यादा निर्भर होती है। लगातार गिरते भूजल स्तर और सिंचाई की समस्या के बीच कम पानी वाली फसलें अब किसानों के लिए बेहतर विकल्प बन रही हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में खेती में सबसे ज्यादा पानी का उपयोग होता है और भविष्य में जल संकट बड़ी चुनौती बन सकता है। ऐसे में कम पानी वाली फसलें टिकाऊ खेती का रास्ता दिखा रही हैं।

कृषि और जल संरक्षण से जुड़े अध्ययनों में भी बताया गया है कि प्राकृतिक और कम पानी वाली खेती मिट्टी की नमी बनाए रखने और खेती की लागत कम करने में मदद करती है।


किसानों को और क्या फायदा मिला?

  • इस फसल में पेस्टिसाइड और फंगीसाइड की जरूरत बहुत कम पड़ती है।
  • जंगली जानवर इस फसल को नुकसान नहीं पहुंचाते।
  • रखरखाव आसान है और मेहनत कम लगती है।
  • फसल तैयार होने के बाद जड़ों को सुखाकर बेचा जाता है।
  • बाजार की चिंता नहीं क्योंकि खरीद की व्यवस्था पहले से तय है।


खेती का नया मॉडल बन रहा छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में यह मॉडल अब दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। जल संकट और बढ़ती लागत के बीच औषधीय खेती किसानों की आय बढ़ाने का बेहतर विकल्प साबित हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार और संस्थाएं किसानों को प्रशिक्षण, बाजार और तकनीकी सहायता दें, तो कम पानी वाली औषधीय फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती हैं।

आज राउतमुड़ा गांव के किसान सिर्फ फसल नहीं उगा रहे, बल्कि खेती का नया रास्ता तैयार कर रहे हैं — ऐसा रास्ता जहां कम पानी में भी खेती लाभ का सौदा बन सकती है।


लेखक

बस्तर संवाददाता

इस लेखक की सभी ख़बरें

और भी पढ़ें