मैनपाट से मानवता और व्यवस्था पर सवाल उठाती तस्वीर
मैनपाट क्षेत्र से एक मार्मिक तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी को उजागर कर दिया है। ग्राम कुनिया जंगलपारा की रहने वाली सुखमनिया बाई अपनी 90 वर्षीय बुजुर्ग सास को हर महीने पीठ पर बैठाकर कई किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं, ताकि उनकी पेंशन मिल सके।
9 किलोमीटर का कठिन सफर
जानकारी के अनुसार सुखमनिया बाई अपनी बुजुर्ग और असहाय सास को पथरीले रास्तों, नदी-नालों और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से गुजरते हुए सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया - नर्मदापुर शाखा तक लेकर जाती हैं। यह पूरा सफर करीब 9 किलोमीटर का होता है, जिसे वह हर महीने अकेले तय करती हैं।
बैंक नियम बने परेशानी की वजह
बैंक के नियमों के अनुसार पेंशन सत्यापन के लिए वृद्धा की स्वयं उपस्थिति जरूरी है। फिंगरप्रिंट और भौतिक सत्यापन के बिना पेंशन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती। यही कारण है कि तेज धूप और कठिन परिस्थितियों के बावजूद बहू को अपनी 90 वर्षीय सास को उठाकर बैंक पहुंचना पड़ता है।
डिजिटल इंडिया के दावों पर सवाल
एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया, घर-घर सेवा और बुजुर्गों के लिए सुविधाओं के बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर मैनपाट जैसे दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों की वास्तविकता कुछ और ही कहानी बयां करती है। यह मामला प्रशासनिक संवेदनशीलता और ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी सेवाओं की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
क्या नहीं हो सकती वैकल्पिक व्यवस्था?
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे मामलों में बुजुर्गों के लिए वैकल्पिक सत्यापन व्यवस्था होनी चाहिए। घर पहुंच सेवा, मोबाइल बैंकिंग टीम या पंचायत स्तर पर सत्यापन जैसी सुविधाएं बुजुर्गों को राहत दे सकती हैं।
व्यवस्था सुधार की मांग
सुखमनिया बाई और उनकी बुजुर्ग सास की यह कहानी सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उन हजारों ग्रामीण परिवारों की हकीकत है, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह घटना व्यवस्था में सुधार और संवेदनशील निर्णयों की जरूरत को सामने लाती है।