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संस्कृति 13 जुलाई 2026 2 मिनट का पठन 13 घंटे पहले

छत्तीसगढ़ का स्टोनहेंज बना करकाभाट, 5000 साल पुरानी महापाषाणिक धरोहर ने खींचा दुनिया का ध्यान

अपडेट किया गया: 2 घंटे पहले

बालोद का करकाभाट महापाषाणिक कब्र समूह 5000 वर्ष पुरानी विरासत का अनमोल प्रमाण है। दक्षिण कोरियाई वैज्ञानिकों ने इसकी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विशेषताओं की सराहना की, वहीं इसे यूनेस्को विश्व धरोहर सूची मे

छत्तीसगढ़ का स्टोनहेंज बना करकाभाट, 5000 साल पुरानी महापाषाणिक धरोहर ने खींचा दुनिया का ध्यान

बालोद छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित करकाभाट महापाषाणिक कब्र समूह एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है। हाल ही में यहां पहुंची दक्षिण कोरियाई वैज्ञानिकों की टीम ने इस प्रागैतिहासिक स्थल की संरचना और ऐतिहासिक महत्व को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। इंग्लैंड के प्रसिद्ध स्टोनहेंज जैसी संरचनात्मक विशेषताओं के कारण विशेषज्ञ अब इसे "भारत का स्टोनहेंज" भी कह रहे हैं।

जिला मुख्यालय से लगभग 16 किलोमीटर दूर बालोद-धमतरी मार्ग पर स्थित यह महापाषाणिक स्थल करीब 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। पुरातत्वविदों के अनुसार लगभग 10 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले इस स्थल पर 5000 से अधिक प्रागैतिहासिक कब्रें मौजूद हैं, जो इसे एशिया के सबसे बड़े महापाषाणिक कब्र समूहों में शामिल करती हैं।

अद्भुत इंजीनियरिंग और खगोलीय ज्ञान का प्रमाण

करकाभाट की सबसे बड़ी विशेषता यहां मौजूद विशाल पाषाण संरचनाएं हैं। कई टन वजनी पत्थरों को अत्यंत संतुलित ढंग से एक-दूसरे के ऊपर स्थापित किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह उस समय के लोगों की उन्नत निर्माण तकनीक और वैज्ञानिक समझ का प्रमाण है।

यहां एकल, सामूहिक और संयुक्त सहित कुल सात प्रकार की कब्र संरचनाएं देखने को मिलती हैं। खास बात यह है कि प्रत्येक तराशे गए पत्थर का चिकना भाग उत्तर दिशा की ओर है, जबकि कई पाषाण स्तंभ पूर्व-पश्चिम दिशा में झुके हुए हैं। इससे संकेत मिलता है कि उस समय के लोग सूर्य की गति और दिशाओं के आधार पर समय तथा मृत्यु से जुड़े अनुष्ठानों की गणना करते थे।

खुदाई में मिले प्राचीन हथियार और स्वर्ण मुद्राएं

वर्ष 1990-91 में पुरातत्व विभाग द्वारा कराई गई खुदाई में यहां से लोहे के प्राचीन हथियार और काले-लाल रंग के मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए थे। बाद के शोध और समीपस्थ कुलिया-कनेरी क्षेत्र की खुदाई में 30 बहुमूल्य स्वर्ण मुद्राएं भी मिलीं।

इनमें से 25 सिक्के नल राजवंश के शासकों भवदत्त और महेंद्रदित्य के काल के बताए जाते हैं। ये ऐतिहासिक सिक्के वर्तमान में रायपुर संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं।

संरक्षण की कमी बनी चिंता

इतिहास और पुरातात्विक महत्व के बावजूद करकाभाट महापाषाणिक स्थल संरक्षण की चुनौतियों का सामना कर रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार फेंसिंग होने के बावजूद कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है। असामाजिक गतिविधियों और ऐतिहासिक पत्थरों की चोरी जैसी घटनाएं इस धरोहर के अस्तित्व के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्थल का समुचित संरक्षण किया जाए, आधुनिक सूचना केंद्र विकसित किए जाएं और पर्यटन सुविधाओं का विस्तार हो, तो यह छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे भारत के प्रमुख विरासत पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है।

यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की मांग

स्थानीय इतिहासकारों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों ने करकाभाट महापाषाणिक कब्र समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की मांग की है। उनका मानना है कि यह स्थल भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और वैज्ञानिक समझ का अनमोल प्रमाण है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए।

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बस्तर संवाददाता

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