बस्तर के घने जंगलों के बीच बसे गाँवों में सदियों से चली आ रही ढोकरा कला आज अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच रही है। मोम के साँचे और पीतल के मिश्रण से बनी यह कला बेजोड़ है।
शिल्पकार पीढ़ियों से अपने पूर्वजों की तकनीकों को सहेजते आ रहे हैं। हर मूर्ति, हर आभूषण में बस्तर की लोक कथाएँ, देवता और दैनिक जीवन की झलक मिलती है।
राज्य सरकार और निजी संस्थाओं की मदद से शिल्पकारों को बेहतर बाज़ार और प्रशिक्षण मिल रहा है, जिससे यह विरासत न केवल जीवित रहेगी बल्कि और समृद्ध होगी।