दंतेवाड़ा। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ दंतेवाड़ा जिले में शिक्षा विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन बच्चों को दोबारा स्कूलों से जोड़ने की है, जो अपने परिवारों के साथ मजदूरी के लिए आंध्र प्रदेश और तेलंगाना चले गए हैं। जिले के कुआकोंडा और कटेकल्याण ब्लॉक से हर वर्ष बड़ी संख्या में परिवार रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है।
शिक्षा विभाग के अनुसार इस वर्ष भी कई परिवार अपने स्कूली बच्चों को साथ लेकर बाहर गए हैं। ऐसे बच्चों की स्कूलों में वापसी सुनिश्चित करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। शिक्षक, बाल मित्र और संकुल समन्वयक लगातार मोबाइल फोन और स्थानीय संपर्क माध्यमों के जरिए पालकों से संवाद कर रहे हैं तथा बच्चों को पुनः स्कूल भेजने की अपील कर रहे हैं।
विभाग का मानना है कि यदि समय रहते इन बच्चों को स्कूलों से नहीं जोड़ा गया, तो उनके स्थायी रूप से पढ़ाई छोड़ने का खतरा बढ़ सकता है। यही कारण है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग ने इस अभियान को प्राथमिकता दी है।
यू-डाइस पोर्टल के आधार पर जिले में कुल 1492 ड्रॉपआउट बच्चों की पहचान की गई है। इनमें दंतेवाड़ा ब्लॉक के 401, कुआकोंडा के 374, गीदम के 365 और कटेकल्याण ब्लॉक के 352 बच्चे शामिल हैं। इन सभी बच्चों को 1 जुलाई तक स्कूलों में वापस लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
शिक्षा विभाग का कहना है कि केवल बच्चों का नामांकन ही नहीं, बल्कि उनकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना भी जरूरी है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर लगातार निगरानी और जनजागरूकता गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा से जुड़ाव बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के साथ-साथ बाल श्रम और अशिक्षा जैसी समस्याओं को भी कम करने में मदद करता है। ऐसे में प्रवासी परिवारों के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
दंतेवाड़ा में चलाया जा रहा यह अभियान न केवल बच्चों की शिक्षा बचाने की पहल है, बल्कि उनके बेहतर भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।