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छत्तीसगढ़ खबर 10 अगस्त 2026 3 मिनट का पठन 4 दिन पहले

छत्तीसगढ़ में प्रॉक्सी व्यवस्था पर रोक, महिला जनप्रतिनिधियों की जगह पति-रिश्तेदार नहीं चला सकेंगे निकाय

अपडेट किया गया: 4 दिन पहले

छत्तीसगढ़ में प्रॉक्सी व्यवस्था पर रोक, महिला जनप्रतिनिधियों की जगह पति-रिश्तेदार नहीं चला सकेंगे निकाय

छत्तीसगढ़ में ‘प्रॉक्सी’ व्यवस्था पर शिकंजा, अब महिला जनप्रतिनिधियों की जगह रिश्तेदार नहीं चला सकेंगे निकाय

छत्तीसगढ़ सरकार ने नगरीय निकायों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पति या अन्य करीबी रिश्तेदारों के जरिए कामकाज संचालित करने वाली ‘प्रॉक्सी’ व्यवस्था पर रोक लगा दी है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने वर्ष 2022 के संबंधित नियमों में संशोधन करते हुए महिला जनप्रतिनिधियों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान किया है।

नए प्रावधान के तहत किसी नगरीय निकाय में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के पति, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन अथवा किसी अन्य करीबी पारिवारिक सदस्य या रिश्तेदार को उनके प्रॉक्सी प्रतिनिधि या समन्वयक के रूप में नामित या नियुक्त नहीं किया जा सकेगा।

महिला के स्थान पर परिवार नहीं ले सकेगा निर्णय

सरकार का स्पष्ट संदेश है कि जनता ने जिस महिला जनप्रतिनिधि को चुना है, निर्णय लेने और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की जवाबदेही भी उसी की होगी। महिला पार्षद, अध्यक्ष या महापौर के स्थान पर उनके पति या परिवार के किसी अन्य सदस्य द्वारा आधिकारिक तौर पर कामकाज नहीं किया जा सकेगा।

नियमों का उद्देश्य महिला आरक्षण की मूल भावना को मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं की भागीदारी स्थानीय शासन में केवल कागजों तक सीमित न रहे।

पंचायतों के बाद नगरीय निकायों में भी सख्ती

महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पति या रिश्तेदारों के हस्तक्षेप का मुद्दा पंचायत स्तर पर पहले भी उठाया जा चुका है। पंचायतों में ‘सरपंच पति’ या अन्य रिश्तेदारों के माध्यम से कामकाज संचालित किए जाने को लेकर राज्य सरकार द्वारा पहले ही निर्देश जारी किए गए थे।

अब इसी दिशा में नगरीय निकायों में भी व्यवस्था को स्पष्ट किया गया है। इसका दायरा केवल पति तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि पुत्र, पुत्री, भाई, बहन और अन्य करीबी रिश्तेदारों को भी इसमें शामिल किया गया है।

क्यों लिया गया फैसला?

सरकार के इस कदम के पीछे प्रमुख उद्देश्य हैं—

  • महिला जनप्रतिनिधियों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • महिला आरक्षण की मूल भावना को लागू करना।
  • स्थानीय शासन में महिलाओं का नेतृत्व मजबूत करना।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की सीधी भूमिका सुनिश्चित करना।
  • निकायों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना।
  • महिला जनप्रतिनिधियों को नेतृत्व और निर्णय लेने के लिए सक्षम बनाना।

नियम तोड़ने पर कार्रवाई

सरकार ने स्पष्ट किया है कि महिला जनप्रतिनिधि के स्थान पर परिवार के किसी सदस्य द्वारा निकाय का कामकाज संचालित किए जाने की शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जा सकती है। बैठकों और आधिकारिक कार्यों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की स्वयं की भागीदारी को महत्व दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है ‘सरपंच पति’ का मुद्दा

महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति या पुरुष रिश्तेदारों द्वारा पंचायत का कामकाज संचालित किए जाने का मुद्दा पहले ही न्यायिक स्तर पर उठ चुका है। ऐसे मामलों में यह सवाल सामने आया है कि यदि पद महिलाओं के लिए आरक्षित है और निर्वाचित भी महिला हुई है, तो वास्तविक निर्णय और प्रशासनिक कार्य किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कैसे संचालित किए जा सकते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में पंचायतों से लेकर नगरीय निकायों तक सरकार का संदेश स्पष्ट दिखाई दे रहा है—महिला के नाम पर मिला निर्वाचित पद परिवार के किसी दूसरे सदस्य के जरिए संचालित नहीं किया जाएगा।

स्थानीय शासन में मजबूत होगा महिला नेतृत्व

इस फैसले से स्थानीय निकायों में महिला नेतृत्व को मजबूती मिलने की उम्मीद है। महिला जनप्रतिनिधियों को स्वयं बैठकों में शामिल होकर निर्णय लेने और जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिलेगा। साथ ही स्थानीय शासन में महिलाओं की भूमिका अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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बस्तर संवाददाता

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