Dr. Gangaram Kashyap with First PhD Award जगदलपुर। बस्तर के सुदूर वनांचल में शिक्षा की अलख जगाने वाले और धुरवा जनजाति समाज के प्रथम पीएचडी धारक डॉ. गंगाराम कश्यप को शिक्षा, साहित्य, अकादमिक शोध और समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। उन्हें प्रतिष्ठित भगवान बिरसा मुंडा स्मृति सम्मान से नवाजा गया।
वर्तमान में विकासखंड दरभा के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय छिंदावाड़ा में प्राचार्य के पद पर कार्यरत डॉ. कश्यप की यह उपलब्धि न केवल उनके लिए, बल्कि बस्तर और पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है।
जमशेदपुर में मिला राष्ट्रीय सम्मान
डॉ. गंगाराम कश्यप को यह सम्मान 24 अगस्त को झारखंड के जमशेदपुर स्थित आदित्यपुर ऑटो क्लस्टर ऑडिटोरियम में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में प्रदान किया गया।
समारोह का आयोजन अस्तित्व चैरिटेबल ट्रस्ट, चंडीगढ़ (पंजाब) और साहित्य श्री दरबार फाउंडेशन, रीवा (मध्यप्रदेश) के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
शिक्षा, साहित्य, शोध और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके निरंतर योगदान को देखते हुए उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
वनांचल में शिक्षा को बनाया मिशन
डॉ. कश्यप की कहानी केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि तक सीमित नहीं है। सुदूर वनांचल में शिक्षक के रूप में काम करते हुए उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।
उन्होंने विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद परिवारों के बच्चों की अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक एवं मानसिक सहायता भी की।
इसी वजह से ग्रामीण समाज और विद्यार्थियों के बीच उनकी पहचान केवल शिक्षक या प्राचार्य की नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और समाजसेवी के रूप में बनी है।
राज्य शिक्षक पुरस्कार से भी हो चुके हैं सम्मानित
डॉ. गंगाराम कश्यप की शैक्षणिक उत्कृष्टता और शिक्षण के प्रति समर्पण को पहले भी सम्मान मिल चुका है।
5 सितंबर 2018 को शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्हें राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के कर कमलों से प्रदान किया गया था।
लेकिन डॉ. कश्यप ने पुरस्कार को सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना।
सम्मान राशि से बनवा दिया स्कूल का मुख्य द्वार
उनकी समाजसेवा का सबसे प्रेरक पहलू यह है कि उन्होंने पुरस्कार से प्राप्त सम्मान राशि को व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च करने के बजाय शिक्षा के काम में लगाया।
राज्यपाल पुरस्कार के रूप में प्राप्त संपूर्ण सम्मान राशि उन्होंने अपने पूर्व पदस्थ विद्यालय माध्यमिक शाला भेजरीपदर के मुख्य द्वार के निर्माण में लगा दी।
उनका मानना रहा कि पुरस्कार से मिलने वाली राशि यदि विद्यार्थियों और शिक्षा के हित में खर्च हो, तो उस सम्मान का महत्व और भी बढ़ जाता है।
97 जोड़ों का कराया सामूहिक विवाह
शिक्षा के साथ डॉ. कश्यप ने अपने धुरवा जनजाति समाज में सामाजिक बदलाव के लिए भी काम किया।
आदिवासी परिवारों को विवाह में होने वाले अनावश्यक खर्च और कर्ज के बोझ से बचाने के उद्देश्य से उन्होंने सहयोग और कुशल प्रबंधन के माध्यम से अब तक 97 जोड़ों का सामूहिक विवाह संपन्न कराया है।
सामूहिक विवाह के जरिए उन्होंने सादगीपूर्ण विवाह को बढ़ावा देने के साथ समाज में एकजुटता का संदेश भी दिया।
शिक्षा से समाजसेवा तक प्रेरणा की कहानी
डॉ. गंगाराम कश्यप की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में बदलाव का रास्ता भी बन सकती है।
धुरवा समाज से उच्च शिक्षा के शिखर तक पहुंचने वाले प्रथम पीएचडी धारक के रूप में उन्होंने अपनी उपलब्धियों को समाज से जोड़ने का प्रयास किया। विद्यालय के विद्यार्थियों से लेकर ग्रामीण परिवारों और अपने समाज तक, उनका प्रयास शिक्षा, सहयोग और सामाजिक जागरूकता को आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर मिला भगवान बिरसा मुंडा स्मृति सम्मान उनकी इसी लंबी यात्रा की एक महत्वपूर्ण पहचान है। उनकी उपलब्धि बस्तर के उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना देखते हैं।