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छत्तीसगढ़ समाचार 30 अगस्त 2026 4 मिनट का पठन 30 अगस्त 2026

बस्तर में राखी बनी शांति और भरोसे का संदेश

अपडेट किया गया: 30 अगस्त 2026

बस्तर में राखी बनी शांति और भरोसे का संदेश

30 अगस्त 2026। बस्तर के भानुप्रतापपुर में इस रक्षाबंधन का एक दृश्य वर्षों पुराने संघर्ष की तस्वीर बदलने वाला नजर आया। करीब 25 साल तक नक्सली संगठन में रहीं मीना ने सुरक्षा बल के जवानों की कलाई पर राखी बांधी। कभी जिन वर्दियों से टकराव और दूरी का रिश्ता रहा था, उसी वर्दी की कलाई पर इस बार भाईचारे और विश्वास का धागा बंधा।

सुरक्षा बल के जवानों ने भी इस रिश्ते को सम्मान के साथ स्वीकार किया। उन्होंने बहन का रिश्ता निभाते हुए शगुन दिया और मिठाई खिलाई। यह दृश्य केवल रक्षाबंधन का आयोजन नहीं था, बल्कि बस्तर में हिंसा से विश्वास और संघर्ष से संवाद की ओर बढ़ते बदलाव की मानवीय तस्वीर भी बन गया।

हाथ में हथियार नहीं, राखी थी

करीब ढाई दशक तक नक्सली संगठन का हिस्सा रहीं मीना और अन्य पूर्व नक्सली महिलाओं के लिए यह पल भावुक और असाधारण था। जंगल और संघर्ष से जुड़ा अतीत पीछे छोड़कर अब वे समाज की मुख्यधारा में नई जिंदगी की शुरुआत कर रही हैं।

भानुप्रतापपुर के सुरक्षा बल कैंप में पूर्व नक्सली महिलाओं ने जवानों की कलाई पर राखी बांधी। जवानों ने भी उन्हें बहन के रूप में स्वीकार करते हुए सम्मान दिया। वर्षों तक संघर्ष के दो अलग-अलग छोर पर खड़े रहे लोगों के बीच राखी का यह धागा संवाद और भरोसे की नई शुरुआत का प्रतीक बना।

महिला पुलिसकर्मियों ने भी बढ़ाया भाईचारे का हाथ

रक्षाबंधन कार्यक्रम में महिला पुलिसकर्मियों ने भी हिस्सा लिया। इस दौरान सुरक्षा बल के जवान और मुख्यधारा में लौट चुकी पूर्व नक्सली महिलाएं एक-दूसरे के सामने संघर्ष के पक्षकार के रूप में नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में नजर आए।

इस पहल का संदेश साफ था कि हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों को स्वीकार्यता और सम्मान मिले, तो शांति और विश्वास की प्रक्रिया को और मजबूती मिल सकती है।

एसपी बोले- रिश्तों से सामान्य होंगे संबंध

कांकेर एसपी निखिल राखेचा ने इस पहल को नक्सल समस्या के समाधान की दिशा में एक अनूठा प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन का यह आयोजन उन प्रयासों का प्रतीक है, जिनके जरिए पुराने तनाव को खत्म कर रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है।

उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन केवल त्योहार मनाने तक सीमित नहीं हैं। इनका उद्देश्य समाज में विश्वास बहाली को मजबूत करना और मुख्यधारा में लौटे लोगों को आगे बढ़ने का अवसर देना भी है।

मीना के लिए राखी बनी नए रिश्ते की शुरुआत

करीब 25 साल तक नक्सली संगठन में रहने के बाद मुख्यधारा में लौटना किसी भी व्यक्ति के लिए एक बड़ा बदलाव है। जंगल की जिंदगी और संघर्ष के लंबे दौर के बाद सामाजिक जीवन में वापसी के लिए केवल सरकारी पुनर्वास ही नहीं, बल्कि समाज की स्वीकार्यता भी जरूरी है।

ऐसे में जवान की कलाई पर राखी बांधना मीना और उनके साथ आई महिलाओं के लिए एक नए सामाजिक रिश्ते की शुरुआत जैसा रहा। यह अतीत की दूरी को पीछे छोड़कर विश्वास और सामान्य जीवन की ओर बढ़ने का संकेत भी है।

बस्तर में बदल रही है कहानी

बस्तर की पहचान लंबे समय तक नक्सली हिंसा, मुठभेड़ों और भय से जुड़ी खबरों से होती रही। लेकिन अब इसी क्षेत्र से विकास, पुनर्वास, सामाजिक जुड़ाव और विश्वास बहाली की नई तस्वीरें भी सामने आ रही हैं।

हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे लोग, गांवों तक पहुंचती सरकारी योजनाएं, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार तथा समाज में विश्वास कायम करने के प्रयास बस्तर के बदलते दौर की कहानी कह रहे हैं।

भानुप्रतापपुर का यह रक्षाबंधन उसी बदलाव की एक भावुक तस्वीर बनकर सामने आया।

एक राखी, कई संदेश

राखी का धागा छोटा जरूर है, लेकिन इसका संदेश बड़ा है। यह उन लोगों के लिए संदेश है जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है कि उनके लिए समाज में वापसी की जगह है।

यह समाज के लिए भी संदेश है कि पुनर्वासित लोगों को सम्मान और स्वीकार्यता देना शांति की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं सुरक्षा बलों के लिए यह पहल कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी के साथ मानवीय संवाद और विश्वास कायम करने की दिशा में एक कदम है।

बस्तर जैसे संघर्ष प्रभावित क्षेत्र में रक्षाबंधन का यह आयोजन इसलिए खास बन जाता है, क्योंकि यहां राखी केवल कलाई पर नहीं बंधी—यह भरोसे पर बंधी।

जहां कभी डर था, वहां अब भरोसे की कोशिश

छत्तीसगढ़ सरकार के नक्सल मुक्त बस्तर के संकल्प के बीच यह पहल बताती है कि स्थायी शांति केवल सुरक्षा अभियानों से नहीं, बल्कि लोगों के बीच विश्वास लौटने से भी मजबूत होती है।

कैंप में राखी बंधने के बाद कुछ देर के लिए अतीत की पहचान पीछे छूट गई। सामने केवल एक भाई, एक बहन और एक ऐसा समाज था, जो संघर्ष के पुराने अध्यायों से आगे बढ़कर शांति और सामान्य जीवन की ओर बढ़ना चाहता है।

बस्तर में कभी बंदूक रिश्तों के बीच खड़ी थी। इस रक्षाबंधन में उसी जगह एक धागा खड़ा था—रिश्तों का, भरोसे का और नए बस्तर का।

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बस्तर संवाददाता

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