दंतेवाड़ा और अबूझमाड़ के घने जंगलों में पिछले 35 वर्षों से स्वास्थ्य सेवा, कुपोषण उन्मूलन और आदिवासी समाज के उत्थान के लिए समर्पित जीवन जीने वाले डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले को वर्ष 2026 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। बस्तर के दूरस्थ और नक्सल प्रभावित इलाकों में उनके योगदान ने उन्हें स्थानीय लोगों के बीच “डॉक्टर भैया” और “सुनीता भाभी” के नाम से विशेष पहचान दिलाई है। (The Logical Indian)
जंगलों के बीच शुरू हुई सेवा की यात्रा
महाराष्ट्र से आने वाले डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले ने वर्ष 1990 में विवाह के बाद अपना जीवन बस्तर के आदिवासी समुदायों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उस समय दंतेवाड़ा और अबूझमाड़ क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं। सड़क, बिजली और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था। ऐसे माहौल में उन्होंने ग्रामीणों के बीच रहकर स्वास्थ्य सेवाओं की शुरुआत की।
मरीज अस्पताल आने से भी डरते थे
ईटीवी भारत को दिए गए विशेष साक्षात्कार में डॉ. गोडबोले ने बताया कि शुरुआती वर्षों में आदिवासी मरीज अस्पताल आने से भी डरते थे। कई लोग इलाज कराने के लिए घने जंगलों और उफनती नदियों को पार कर पहुंचते थे। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक मरीज को बारिश के मौसम में दो बार इंद्रावती नदी पार कर अस्पताल लाया गया था। मरीज को एक साथ जॉन्डिस, डायबिटीज और टीबी जैसी गंभीर बीमारियां थीं, लेकिन आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने इमली बेचकर इलाज का खर्च जुटाया।
जब डॉक्टर खुद पहुंचे मरीज के घर
डॉ. गोडबोले ने बताया कि कई बार हालात ऐसे होते थे कि मरीज अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते थे। एक बार एक युवक उन्हें अपने गांव के बीमार पिता को देखने के लिए बुलाने आया। डॉक्टर ने लगभग ढाई घंटे का कठिन जंगली रास्ता तय कर मरीज तक पहुंचकर इलाज किया। उन्होंने गांव के युवक को घाव की ड्रेसिंग करने की ट्रेनिंग दी और लगातार उपचार के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो गया।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भी नहीं रुकी सेवा
बस्तर लंबे समय से नक्सल गतिविधियों के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन गोडबोले दंपति का कहना है कि उन्हें कभी अपने काम के कारण विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। उनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य सेवा और कुपोषण के खिलाफ लड़ाई था। यही कारण रहा कि स्थानीय समुदाय और क्षेत्र के विभिन्न समूहों ने उनके कार्यों का सम्मान किया। डॉ. गोडबोले का मानना है कि जब सेवा निस्वार्थ भाव से की जाती है तो लोगों का विश्वास स्वतः प्राप्त हो जाता है। (NewsBytes)
‘डॉक्टर भैया’ और ‘सुनीता भाभी’ की पहचान
सुनीता गोडबोले ने स्थानीय गोंडी और हल्बी भाषाएं सीखकर आदिवासी महिलाओं और बच्चों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने पोषण, महिला स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल विकास पर व्यापक काम किया। गांव-गांव में कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क तैयार किया गया, जिसने स्वास्थ्य जागरूकता अभियान को सफल बनाया। इसी विश्वास और अपनत्व के कारण स्थानीय लोग उन्हें “डॉक्टर भैया” और “सुनीता भाभी” कहकर बुलाने लगे।
कुपोषण के खिलाफ बड़ा अभियान
गोडबोले दंपति ने वर्षों तक कुपोषण और एनीमिया के खिलाफ अभियान चलाया। सुनीता गोडबोले के प्रयासों से सैकड़ों गंभीर कुपोषित बच्चों को नया जीवन मिला। स्वास्थ्य शिविरों, जागरूकता कार्यक्रमों और पोषण संबंधी प्रशिक्षण के माध्यम से हजारों परिवारों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई गईं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने एक लाख से अधिक लोगों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया है।
आदिवासी समाज की अच्छाइयों को बचाने का संदेश
साक्षात्कार के दौरान गोडबोले दंपति ने आदिवासी समाज की प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली और बेटियों के प्रति सम्मान को उसकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक मूल्यों को बचाए रखना भी जरूरी है। उनका मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और नशा मुक्ति जैसे विषयों पर समाज को और अधिक सक्रिय होना चाहिए।
पद्मश्री सम्मान पर क्या बोले गोडबोले दंपति?
पद्मश्री सम्मान मिलने पर दोनों ने भारत सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार और जिला प्रशासन का आभार व्यक्त किया। उनका कहना है कि यह सम्मान केवल उनका नहीं बल्कि उन सभी कार्यकर्ताओं, ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्यकर्मियों का है जिन्होंने वर्षों तक उनके साथ मिलकर काम किया। उन्होंने कहा कि समाज के विकास में हर व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण होता है और सामूहिक प्रयासों से ही बदलाव संभव है।
बस्तर के लिए प्रेरणा बनी सेवा की मिसाल
आज जब बस्तर विकास और बदलाव के नए दौर से गुजर रहा है, तब डॉ. रामचंद्र गोडबोले और सुनीता गोडबोले की कहानी यह साबित करती है कि समर्पण, विश्वास और सेवा भावना से सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बदलाव लाया जा सकता है। उनका पद्मश्री सम्मान न केवल उनकी मेहनत की पहचान है, बल्कि बस्तर के आदिवासी समाज के संघर्ष, विश्वास और विकास की कहानी को भी राष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिलाता है।