अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस विशेष
बैलाडीला की पहाड़ियों से एक बेहद महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज सामने आई है। विस्तृत जैव विविधता सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने ‘जंगली अरहर’ की दुर्लभ प्रजाति कजानस स्काराबायोइड्स (Cajanus scarabaeoides) की महत्वपूर्ण प्राकृतिक आबादी दर्ज की है। विशेषज्ञ इसे खेती में उपयोग होने वाली अरहर की मूल जंगली पूर्वज प्रजाति मानते हैं, जिसमें भविष्य की जलवायु चुनौतियों से मुकाबला करने की अद्भुत क्षमता मौजूद है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता और उच्च प्रोटीन जैसे दुर्लभ गुण
वैज्ञानिकों के अनुसार इस जंगली अरहर प्रजाति में रोग प्रतिरोधक क्षमता, अत्यधिक गर्मी और सूखे को सहन करने की क्षमता तथा उच्च प्रोटीन जैसे दुर्लभ आनुवंशिक गुण पाए गए हैं। यही कारण है कि इसे भविष्य की उन्नत और जलवायु-अनुकूल फसलें विकसित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने बैलाडीला क्षेत्र में पाई गई इस प्रजाति में छोटी फलियां, गहरे रंग के बीज और विशिष्ट संरचनात्मक विशेषताएं दर्ज कीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह आनुवंशिक विविधता आने वाले समय में ऐसी नई फसल किस्में विकसित करने में मदद करेगी, जो सूखा, गर्मी और बीमारियों के प्रति अधिक मजबूत होंगी।
बस्तर बना जैव विविधता का वैश्विक केंद्र
बस्तर क्षेत्र पहले से ही अपनी समृद्ध प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध रहा है। इस नए शोध ने बस्तर को वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में और अधिक मजबूत पहचान दिलाई है।
अध्ययन के दौरान बैलाडीला क्षेत्र में दुर्लभ वनस्पतियों, वन्यजीवों और जंगली फसली रिश्तेदारों की उल्लेखनीय उपस्थिति भी दर्ज की गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, जलवायु अनुकूल खेती और कृषि अनुसंधान के लिए भविष्य में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
खनन गतिविधियों से बढ़ रहा खतरा
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बैलाडीला, किरंदुल और बचेली क्षेत्र में लगातार बढ़ती खनन गतिविधियां इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बन रही हैं। इसी कारण वैज्ञानिकों ने इन पहाड़ी क्षेत्रों को ‘जैव विविधता विरासत स्थल’ घोषित करने की मांग की है, ताकि इस दुर्लभ प्रजाति और प्राकृतिक संपदा का संरक्षण किया जा सके।
वैज्ञानिकों की टीम ने किया सर्वेक्षण
यह सर्वेक्षण इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। टीम में प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा, डॉ. मयूरेश माहुरे, डॉ. कैलाश चंद भट्ट और डॉ. पंकज कुमार कंत्रेजीवा शामिल रहे।